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त्रिया चरित्रम

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मेरे जीवन में कई बार ऐसी घटनाएं घटी हुई है की मैं लिखने के लिए बाध्य हो रहा हूं। ये मेरा प्रथम लेखन है तो अगर किसी प्रकार की त्रुटि दिखे तो माफ करना । कई स्त्रियों द्वारा मुंह की खाने के बाद मेरे दिमाग में एक श्लोक आता है जो काफी पुराना है कि   त्रिया चरित्रं पुरुषस्य भाग्यम देवो न जानाति कुतो मनुष्य ऐसा मेरे साथ हर बार होता था ......कोई स्त्री बुरा नहीं मानना जब तक वह पूरा पढ़ना ले ........क्योंकि........ यह लेखन मैंने समाप्त पहले किया........ शुरुआत बाद में की है । बात अजीब लग रही होगी .......क्योंकि लोग पहले शुरू करते हैं फिर समाप्त होता है लेकिन मैंने ठीक उल्टा किया हुआ है ।  यह श्लोक आने के बाद मन में एक ख्याल आया कि एक लाइन का श्लोक तो हो ही नहीं सकता तो मैंने थोड़ा सा खंगाला पुस्तकों को तो वहां से मुझे इस लोक की पहली लाइन मिली जो कि मैं आपके सामने ला रहा हूं और जानकारी के लिए बता दूं कि जिस पुस्तक में यह श्लोक मुझे मिला वह विक्रमादित्य के द्वारा शायद लिखी गई थी जिसके तीन हिस्से हैं भ्रतहारी शतक करके है वह और जैसा कि पुस्तक को हमने देखा पहला भाग नीति शतक दूस...