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Showing posts from February, 2022

निर्लज्ज मन का इलाज

कुछ मित्र नर्मदा किनारे पिकनिक मना रहे थे.  . उन्होंने देखा कि सामने पेड़ के नीचे के एक व्यक्ति कंडों की आँच पर रोटियाँ सेंक रहा था.  . कुल तीन रोटियाँ उसने बनाई. फिर कुछ देर बाद उस व्यक्ति ने रोटियाँ तोड़ तोड़ कर नर्मदा को अर्पित कर दी  . और दो मुट्ठी राख पानी में धोली और पी गया.. फिर अपनी झोली उठाई और आगे बढ़ चला. . मित्र मंडली को यह सब देखकर बड़ा अजीब लगा और उन्होंने ने उस व्यक्ति को रोक कर पूछा.. . बाबा आपने यह क्या किया..? रोटियाँ बनानी थी तो खाई क्यों नहीं..?  . खाना नहीं थी तो बनाई क्यों..? बात अटपटी लगती है. समझाकर जाइये. . उस व्यक्ति ने अपनी मनोवेदना शब्दों में बाँध दी.. . भैया, नर्मदा माई की परिक्रमा पर निकला हूँ. भिक्षाटन से पेट भरने का संकल्प है.  . पर्याप्त मिल जाता है. यात्रा भी समाप्ति पर ही है.  . मगर यह मन तीन दिनों से रोटी की रट लगाए था.. चना चबैना से इसे तृप्ति नहीं, रोटी चाहिये. . उसी का स्मरण, उसी का कीर्तन. कल तो माई के दर्शन में भी मुदित नहीं हुआ. कीर्तन में भी भटकता ही रहा.  . रोटी चाहिये थी इसे.... . आज पहली बार मुहँ खोलकर कहीं ...

तृष्णा

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एक बार एक नदी में हाथी की लाश बही जा रही थी।  जब एक कौए ने लाश देखी, तो प्रसन्न हो उठा, तुरंत उस पर आ बैठा। यथेष्ट मांस खाया। नदी का जल पिया।  उस लाश पर इधर-उधर फुदकते हुए कौए ने परम तृप्ति की डकार ली।  वह सोचने लगा, अहा ! यह तो अत्यंत सुंदर यान है, यहां भोजन और जल की भी कमी नहीं। फिर इसे छोड़कर अन्यत्र क्यों भटकता फिरूं? कौआ नदी के साथ बहने वाली उस लाश के ऊपर कई दिनों तक रमता रहा। भूख लगने पर वह लाश को नोचकर खा लेता, प्यास लगने पर नदी का पानी पी लेता।  अगाध जलराशि, उसका तेज प्रवाह, किनारे पर दूर-दूर तक फैले प्रकृति के मनोहरी दृश्य-इन्हें देख-देखकर वह विभोर होता रहा।   नदी एक दिन आखिर महासागर में मिली। वह मुदित थी कि उसे अपना गंतव्य प्राप्त हुआ। सागर से मिलना ही उसका चरम लक्ष्य था, किंतु उस दिन लक्ष्यहीन कौए की तो बड़ी दुर्गति हो गई।  चार दिन की मौज-मस्ती ने कौवे को ऐसी जगह ला पटका था, जहां उसके लिए न भोजन था, न पेयजल और न ही कोई आश्रय। सब ओर सीमाहीन अनंत खारी जल-राशि तरंगायित हो रही थी। कौआ थका-हारा और भूखा-प्यासा कुछ दिन तक तो चारों दिशाओं में पंख फट...

प्रथम पल की यादें

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बचपन में हमने गांव में #साइकिल तीन चरणों में सीखी थी ,  पहला चरण   -   कैंची  दूसरा चरण    -   डंडा  तीसरा चरण   -   गद्दी ... तब साइकिल की ऊंचाई 24 इंच हुआ करती थी जो खड़े होने पर हमारे कंधे के बराबर आती थी ऐसी साइकिल से गद्दी चलाना मुनासिब नहीं होता था। #कैंची वो कला होती थी जहां हम साइकिल के फ़्रेम में बने त्रिकोण के बीच घुस कर दोनो पैरों को दोनो पैडल पर रख कर चलाते थे। और जब हम ऐसे चलाते थे तो अपना #सीना_तान कर टेढ़ा होकर हैंडिल के पीछे से चेहरा बाहर निकाल लेते थे, और क्लींङ क्लींङ करके घंटी इसलिए बजाते थे ताकी लोग बाग़ देख सकें की लड़का साईकिल दौड़ा रहा है। आज की पीढ़ी इस " एडवेंचर " से महरूम है उन्हे नही पता की आठ दस साल की उमर में 24 इंच की साइकिल चलाना " जहाज " उड़ाने जैसा होता था। हमने ना जाने कितने दफे अपने घुटने और मुंह तुड़वाए है और गज़ब की बात ये है कि तब #दर्द भी नही होता था, गिरने के बाद चारो तरफ देख कर चुपचाप खड़े हो जाते थे अपना हाफ कच्छा पोंछते हुए। अब तकनीकी ने बहुत तरक्क़ी कर ली है...

समय

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जैसे जैसे मेरी उम्र में वृद्धि होती जा रही है, मुझे समझ मैं आता जा रहा है, कि अगर मैं Rs. 300 की घड़ी पहनूं या Rs. 3000 की या 30,000 की, तीनों समय एक जैसा ही बताएंगी। मेरे पास Rs. 300 का बैग हो या Rs. 3000 का, इसके अंदर के सामान में कोई परिवर्तन नहीं होंगा। मैं 300 गज के मकान में रहूं या 3000 गज के मकान में, तन्हाई का एहसास एक जैसा ही होगा। आख़िर में मुझे यह भी पता चला कि यदि मैं बिजनेस क्लास में यात्रा करूं या इक्नामी क्लास में, अपनी मंजिल पर उसी नियत समय पर ही पहुँचूँगा। इसीलिए, अपने बच्चों को बहुत ज्यादा अमीर होने के लिए प्रोत्साहित मत करो बल्कि उन्हें यह सिखाओ कि वे खुश कैसे रह सकते हैं और जब बड़े हों, तो चीजों के महत्व को देखें, उसकी कीमत को नहीं। फ्रांस के एक वाणिज्य मंत्री का कहना था - ब्रांडेड चीजें व्यापारिक दुनिया का सबसे बड़ा झूठ होती हैं, जिनका असल उद्देश्य तो अमीरों की जेब से पैसा निकालना होता है, लेकिन गरीब और मध्यम वर्ग लोग इससे बहुत ज्यादा प्रभावित होते हैं। क्या यह आवश्यक है कि मैं Iphone लेकर चलूं फिरू, ताकि लोग मुझे बुद्धिमान और समझदार मानें?? क्या यह आव...

रजाई

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सोते सोते अचानक से ठण्ड सी महसूस हुई और आँख खुल गयी. टेबल क्लॉक पर नजर पडी तो देखा रात के 2 बज रहे थे और रजाई आधी पलंग के नीचे पड़ी थी.नींद और आलस में उठने का मन नहीं कर रहा था.पर ठण्ड  भी बर्दास्त नहीं हो रही थी . झुंझला कर बेड से उठा और रजाई उठा कर वापिस बेड पर रखी.तब तक नींद उचट गयी. ठीक से रजाई ले कर लेटा तो नीद आँखों से कोसों दूर चली जा चुकी थी. और मन एक बार फिर से पुरानी यादों में खो गया    पिछली सर्दियों की बात है एक दिन सुबह सुबह उठते हुए सारिका बडबड़ा रही थी “ सुनो तुम पूरी रात उलटते पुलटते रहते हो सारी रजाई खीच लेते हो मेरी नींद खराब होती है. कल से मै अपनी अलग रजाई लेकर सोउंगी “.  “ अरे कहाँ मै तो अपनी साइड पर ही लेटता हूँ.” मैंने कहा.  “ रात में तीन तीन  बार उठ कर रजाई ठीक करती हूँ , जब मै नही रहूंगी तब पता चलेगा ” कह कर वो चाय बनाने चली गयी.   रात जब फिर से सोने के लिए बेड पर आये तो एक ही रजाई थी  “ क्या हुआ तुम्हारी रजाई कहाँ है “ मैने छेड़ते हुए पुछा.  “ अरे एक रजाई में रहते है तो मुझे पता चल जाता है कि तुम खुले पड़े हो . अगर अ...