रजाई
सोते सोते अचानक से ठण्ड सी महसूस हुई और आँख खुल गयी. टेबल क्लॉक पर नजर पडी तो देखा रात के 2 बज रहे थे और रजाई आधी पलंग के नीचे पड़ी थी.नींद और आलस में उठने का मन नहीं कर रहा था.पर ठण्ड भी बर्दास्त नहीं हो रही थी . झुंझला कर बेड से उठा और रजाई उठा कर वापिस बेड पर रखी.तब तक नींद उचट गयी. ठीक से रजाई ले कर लेटा तो नीद आँखों से कोसों दूर चली जा चुकी थी. और मन एक बार फिर से पुरानी यादों में खो गया
पिछली सर्दियों की बात है एक दिन सुबह सुबह उठते हुए सारिका बडबड़ा रही थी “ सुनो तुम पूरी रात उलटते पुलटते रहते हो सारी रजाई खीच लेते हो मेरी नींद खराब होती है. कल से मै अपनी अलग रजाई लेकर सोउंगी “.
“ अरे कहाँ मै तो अपनी साइड पर ही लेटता हूँ.” मैंने कहा.
“ रात में तीन तीन बार उठ कर रजाई ठीक करती हूँ , जब मै नही रहूंगी तब पता चलेगा ” कह कर वो चाय बनाने चली गयी.
रात जब फिर से सोने के लिए बेड पर आये तो एक ही रजाई थी
“ क्या हुआ तुम्हारी रजाई कहाँ है “ मैने छेड़ते हुए पुछा.
“ अरे एक रजाई में रहते है तो मुझे पता चल जाता है कि तुम खुले पड़े हो . अगर अलग रजाई मे होंगे तो मुझे पता ही नहीं चलेगा और तुम्हें ठण्ड लग जायेगी"
एक बार फिर से
उसने मुझे याद दिला दिया
कि
कितना अधुरा है आदमी
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