त्रिया चरित्रम

मेरे जीवन में कई बार ऐसी घटनाएं घटी हुई है की मैं लिखने के लिए बाध्य हो रहा हूं।
ये मेरा प्रथम लेखन है तो अगर किसी प्रकार की त्रुटि दिखे तो माफ करना ।
कई स्त्रियों द्वारा मुंह की खाने के बाद मेरे दिमाग में एक श्लोक आता है जो काफी पुराना है कि
 
त्रिया चरित्रं पुरुषस्य भाग्यम देवो न जानाति कुतो मनुष्य

ऐसा मेरे साथ हर बार होता था ......कोई स्त्री बुरा नहीं मानना जब तक वह पूरा पढ़ना ले ........क्योंकि........ यह लेखन मैंने समाप्त पहले किया........ शुरुआत बाद में की है । बात अजीब लग रही होगी .......क्योंकि लोग पहले शुरू करते हैं फिर समाप्त होता है लेकिन मैंने ठीक उल्टा किया हुआ है ।
 यह श्लोक आने के बाद मन में एक ख्याल आया कि एक लाइन का श्लोक तो हो ही नहीं सकता तो मैंने थोड़ा सा खंगाला पुस्तकों को तो वहां से मुझे इस लोक की पहली लाइन मिली जो कि मैं आपके सामने ला रहा हूं और जानकारी के लिए बता दूं कि जिस पुस्तक में यह श्लोक मुझे मिला वह विक्रमादित्य के द्वारा शायद लिखी गई थी जिसके तीन हिस्से हैं भ्रतहारी शतक करके है वह और जैसा कि पुस्तक को हमने देखा पहला भाग नीति शतक दूसरा वैराग्य शतक और श्रृंगार शतक बहुत ही रसिया किस्म के थे विक्रमादित्य जी चलिए हम श्लोक पर ध्यान देते हैं

नृपस्य चित्तं कृपणस्य वित्तं मनोरथम दुर्जन मानवानाम् ।

त्रिया चरित्रं पुरुष्यस्यभाग्यं दैवो न जानाति कुतो मनुष्यः ।।

“राजा के चित्त में क्या है कि वो अपराधी को सज़ा देगा या नहीं, कृपण यानी कंजूस के पास कितना धन है, दुष्ट के मन में क्या चल रहा है, स्त्री का तत्कालीन चरित्र क्या है और पुरुष का भाग्य, ये तो देवता भी नहीं बता सकते मनुष्य की तो बात ही छोड़ दो।”

दिमाग की नसें हिल गई भाई साहब हालांकि यह अर्थ गूगल पर मिल गया मुझे मैंने नहीं बनाया इतना ज्ञानी नहीं हूं पर यह पढ़ने के बाद कुछ चीज है मैंने और सर्च किए गूगल बाबा पर ही और मैंने अपनी तरफ से भी कुछ लाइनें बनाई आपके सामने ला रहा हूं धन्यवाद

स्त्री चरित्रं..देवो न जानेति, कुतो मनुष्यः !

स्त्री के विषय में महर्षि वेदव्यास ने एक सार्थक बात कही है - स्त्री को मनुष्य तो क्या, देवता भी नहीं समझ सके हैं। उस के चरित्र में जितना फैलाव, गहराई और ऊंचाई है; वह कल्पना से परे है। महाभारत कालीन अनेक स्त्रियों के दृष्टांत उन के सामने साक्षात थे - मौन त्याग, सत्य और प्रखरता (गांधारी), गोपनीयता, धैर्य, त्याग (कुंती), शुचिता, तेजस्विता (द्रौपदी), निष्काम प्रेम (राधा, वृषाली), अचला (उत्तरा), निस्पृह ( चित्रांगदा, उलूपी) और अनन्य भक्ति ( विदुरा, विदुर की पत्नी)। महर्षि ने इन विलक्षण स्त्री चरित्रों का मूल्यांकन करते हुए ही उक्त श्लोक लिखा थां ।

पुरुष समाज में इस उक्ति को स्त्रियों के विरुद्ध नकारात्मक टिप्पणी की तरह इस्तेमाल किया जाता रहा है। यह गलत है। व्यास जी ने एक ही श्लोक के अर्द्ध भाग ( स्त्री चरित्रं....देवो न जानेति, कुतो मनुष्यः) में ‘स्त्री चरित मानस’ लिख दिया। जैसे राम चरितमानस, वैसे ही नारी चरितमानस।
कुछ दृष्टांत -
गांधरी ; पति अंधा था तो खुद ने भी आंखों पर पट्टी बांध ली। सायास(प्रयत्न पूर्वक, या खुद ही) अंधी हो गई। दुर्याधन का पापाचार सहन करती रही किंतु युद्ध के समय उसे ‘विजयी भवः’ नहीं कहा ; अपने ही पुत्र को विजेता होने का आशीर्वाद नहीं दिया ! ...जब श्रीकृष्ण सामने आये तो सौ मृत पुत्रों की मां के क्रंदन ने उन्हें शाप दे दिया ! कैसी स्त्री थी गांधारी, जिसका शाप भगवान को भी लग गया ! ...फिर शाप दे कर स्वयं ही रो दी कि मैने यह क्या कर दिया !! विलक्षण चरित्र।

कुंती ; कर्ण के जन्म का रहस्य छिपाए रही। उसे अपने ही सामने प्रतिदिन प्रताङित होते हुए देखती रही। जब पाण्डवों पर युद्ध में कर्ण के हाथें सम्भावित मृत्यु का संकट आया तो उसी परितयक्त पुत्र के पास याचना के लिए चली गई। पाण्डवों के लिए अभय दान मांग लिया। युद्ध के बाद राज भोग का अवसर आया तो कर्ण ही अंदर की कसक बन गया। महल के सुख चुभने लगे। कुंती अपने पुत्रों द्वारा उपेक्षित गांधारी और धृतराष्ट्र के साथ वन में चली गई। अद्भुत !

द्रौपदी ; पांच पति में विभाजित द्रौपदी की शुचिता कैसी रही होगी कि आज पंच कन्याओं में याद की जाती है। उस ने दुर्योधन को ‘अंधे का पुत्र अंधा’ कहा। चीर हरण के समय एक यक्ष प्रश्न उठाया कि पति या पुरुष को यह अधिकार किस ने दिया कि वह जुए में स्त्री को ही दांव पर लगा दे ! अपने पांच पुत्रों के हत्यारे अश्वत्थामा को उस ने माफ कर दिया। कर्ण की मृत्यु पर माथे की बिंदी पौंछने के लिए हाथ उठा लेने वाली याज्ञसेनी के अंतस्थ रोदन ने कृष्ण की भी आंखें नम कर दीं। कृष्ण ने उसे रोक दिया। अनाहत प्रेम का वह अनहद नाद कृष्ण ने सुन लियां ..अनुपम द्रौपदी !

वृषाली ; निष्काम प्रेम की प्रतीक दूसरी राधा ! कर्ण की प्रेयसी थी। कर्ण का विवाह प्रतिकूल परिस्थिति वश अन्य युवती से हो गया। चालीस वर्ष तक वृषाली अपने हृदय में उस प्रेम का अनादि नाद सुनती रही। फिर कर्ण के अवसान पर सती हो गई , अज्ञात स्थान पर भस्म हो गई। वृषाली अनन्या थी !

वेद व्यास के कथन का तात्पर्य ऐसी स्त्रियों को नमन करना था। ..इधर आधुनिक युग में विश्व विख्यात मनोवैज्ञानिक सिगमंड फ्रायड ने लिखा कि - मैं स्त्री के मन को नहीं समझ सका। जीवन भर मानव मन का ही अध्ययन करता रहा हूं ; लेकिन नारी के मन की गहराई एवं ऊंचाई को नहीं जान सका। आगे कहा कि जो कुछ समझा हूं वह ऐसा है - स्त्री अपने हृदय में स्थिर रहती हे, देह में नहीं। उसे स्वीकार करोगे तो घर में रोज ही प्रेमोत्सव रहेगा। उस की उपेक्षा, तिरस्कार, प्रताङना आदि पूरे समाज के लिए अभिशाप बन जाती है। उपेक्षिता नारी आजीवन साथ रह कर भी पति से असंलग्न रह जाती है। उस में उत्कर्ष है, उत्सव है, उन्नयन है, ओर जीवन का रसायन है। वह पुरुष के व्यक्तित्व की कसौटी है।

हमारे ऋषि कहते हैं - मातृ (स्त्री) देवो भवः

ऐसी स्त्रियों को प्रणाम ।

Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

उत्तर प्रदेश

निर्लज्ज मन का इलाज